एक ही व्यक्ति को कभी पाकिस्तान भेजा गया, कभी मृत दिखाया गया और फिर उसी के नाम पर ज़मीन बेच दी गई1917 मे और नामान्तरण भी हुआ।
लखनऊ।उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन के दावों के बीच सरोजनीनगर तहसील से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने राजस्व तंत्र, दस्तावेज़ी सत्यापन और वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
🟥 सेवई गांव की करोड़ों की ज़मीन का मामला
सरोजनीनगर तहसील के ग्राम सेवई में स्थित गाटा संख्या 780, 537 और 615 को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आरोप है कि इन ज़मीनों पर कब्ज़ा और बिक्री के लिए मृत्यु, पलायन और वारिस होने की अलग-अलग कहानियाँ गढ़ी गईं।
🟥 कब्रिस्तान की रसीद से “मौत” घोषित
जांच में सामने आया है कि सैय्यद बहादुर हुसैन को वर्ष 1969 में मृत दिखाने के लिए कब्रिस्तान की एक साधारण रसीद को दस्तावेज़ बनाया गया।
जबकि यह रसीद—न तो सरकारी मृत्यु प्रमाण पत्र है न नगर निगम या स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी
न ही किसी वैध पहचान या पोस्टमार्टम का प्रमाण
@ इसके बावजूद इसी रसीद के आधार पर:खतौनी में नाम चढ़ाया गया और बाद में ज़मीन आगे बेच दी गई।
कोर्ट में दूसरी कहानी : “1968 में पाकिस्तान चले गए”
खोजी दस्तावेज़ यह भी बताते हैं कि
गोलागंज स्थित संपत्ति हड़पने के लिए
नावेद द्वारा कोर्ट में शपथपत्र पर कहा गया कि—
“सैय्यद बहादुर हुसैन 1968 में पाकिस्तान चले गए थे।”
❓ इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है—
@ जो व्यक्ति 1968 में जीवित होकर पाकिस्तान गया,
@वह 1969 में भारत में मृत कैसे हो गया?
एक व्यक्ति, तीन पहचान — प्रशासन कैसे मान गया?
इस पूरे मामले में एक ही व्यक्ति को:
1- पाकिस्तान पलायनकर्ता 1969 में मृत
2-ज़मीन का कथित “वारिस”तीनों रूपों में मान लिया गया।
3- विशेषज्ञों का कहना है कि यह साधारण गलती नहीं,
बल्कि सुनियोजित दस्तावेज़ी धोखाधड़ी का संकेत है।
4-फर्जी आधार कार्ड से रजिस्ट्री का आरोप
5-मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है।
सूत्रों के अनुसार—
1917 में राजस्व तंत्र के भीतर
पूनम सिंह द्वारा सैय्यद बहादुर हुसैन के नाम से फर्जी आधार कार्ड तैयार कराया गया उसी आधार कार्ड के आधार पर
रजिस्ट्री कराई गई,और नामांतरण भी करा लिया गया हैरानी की बात यह है कि: यह नामांतरण अब तक निरस्त नहीं हुआ है।
# प्रशासन से उठते सवाल
कब्रिस्तान की रसीद को मृत्यु प्रमाण कैसे माना गया?
एक व्यक्ति को जीवित, मृत और वारिस तीनों कैसे मान लिया गया?
फर्जी आधार कार्ड से रजिस्ट्री किसकी मिलीभगत से हुई?
किन राजस्व कर्मियों ने बिना सत्यापन दस्तख़त किए?
# निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ ज़मीन विवाद नहीं,
बल्कि राजस्व तंत्र की पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी पर सीधा सवाल है।अब देखना यह है कि,योगी सरकार के भ्रष्टाचार-मुक्त अभियान के तहत,इस प्रकरण में कब और क्या कार्रवाई होती है।



