
लखनऊ।सरोजनी नगर तहसील से सामने आए एक गंभीर प्रकरण ने राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आरोप है कि गाटा संख्या 780, 537 एवं 615 में नावेद पुत्र हिदायत हुसैन (निवासी गोलागंज) द्वारा 1969 की कथित/फर्जी मृत्यु रसीद और गलत सजरा (वंशावली) के आधार पर खतौनी में नामांतरण/वारासत कराई गई, जबकि नावेद के पिता हिदायत हुसैन का नाम इन गाटों की खतौनी में दर्ज ही नहीं है। इतना ही नहीं, हिदायत हुसैन के पिता का नाम भी संबंधित खतौनी में कहीं दर्ज नहीं पाया गया।
सूत्रों के अनुसार, जब पिता और दादा—दोनों का नाम खतौनी में नहीं है, तो फिर पुत्र के पक्ष में वारासत कैसे संभव हुई? यह स्थिति उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के प्रावधानों के विपरीत है और राजस्व अभिलेखों में गंभीर अनियमितता की ओर इशारा करती है। आरोप है कि गलत सजरा तैयार कर मनगढ़ंत वंशावली दिखाई गई, जिससे करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि पर अवैध अधिकार स्थापित किया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यदि कथित मृत्यु 1969 में हो चुकी थी, तो 54 वर्ष बाद 2023 में वारासत कैसे कर दी गई? क्या बिना समुचित सत्यापन और सजरा–खतौनी मिलान के दस्तावेज़ स्वीकार कर लिए गए? इस प्रक्रिया में राजस्व कर्मियों की भूमिका की भी जांच की मांग उठ रही है।

पीड़ित पक्ष और स्थानीय लोगों ने मांग की है कि कथित फर्जी मृत्यु रसीद, गलत सजरा और अवैध वारासत आदेश को तत्काल निरस्त किया जाए, तीनों गाटों (780, 537, 615) की खतौनी का पुनः परीक्षण कराया जाए तथा दोषियों—चाहे वे लाभार्थी हों या राजस्व कर्मी—के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। मामले में IPC की धाराओं 420, 467, 468, 471 एवं 120-B के तहत आपराधिक कार्रवाई की मांग भी की गई है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब सरकार डिजिटल खतौनी, पारदर्शी नामांतरण और भूमाफिया के खिलाफ सख्ती की बात कर रही है। सरोजनी नगर तहसील का यह प्रकरण राजस्व सुधारों पर फिरते पानी जैसा बताया जा रहा है। पीड़ित पक्ष ने जिलाधिकारी, मंडलायुक्त और राजस्व परिषद से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।




