
— लोक निर्माण टाईम्स विशेष रिपोर्ट
लखनऊ/कोलकाता। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हाल ही में वक्फ कानून को लेकर भड़की हिंसा ने एक बार फिर इस ऐतिहासिक भूमि की पहचान और भूमिका को राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया है। जहां एक ओर मुर्शिदाबाद को भारत के पूर्वी हिस्से में हिंदू संस्कृति, तंत्र साधना और सनातन परंपरा की उर्वरा भूमि माना जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर यह इलाका इस्लामी कट्टरवाद के कई प्रयोगों का गवाह भी रहा है।

इतिहासकारों के अनुसार, मुर्शिदाबाद वह स्थान है जहां से कोलकाता और ढाका में इस्लामी प्रशासनिक व धार्मिक विस्तार की नींव रखी गई। यह इलाका औरंगजेब के शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता और जबरन धर्मांतरण जैसे मामलों का केंद्र रहा। दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम शासन की नींव यहां किसी विदेशी आक्रमणकारी ने नहीं, बल्कि एक हिंदू ब्राह्मण सूर्य नारायण मिश्रा ने रखी, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर मोहम्मद हादी उर्फ कुली खान नाम से सत्ता संभाली और मुर्शिदाबाद को मुस्लिम सत्ता का गढ़ बनाया।
यह वही भूमि है जहाँ से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की विचारधारा पनपी और भारत का विभाजन हुआ। आज जब यहां एसडीपीआई और अन्य बांग्लादेशी संगठनों की सक्रियता के इनपुट मिल रहे हैं, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि मुर्शिदाबाद एक बार फिर धार्मिक असहिष्णुता की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।
वर्तमान में नए वक्फ कानून को लेकर भड़की हिंसा, तीन लोगों की मौत और सैकड़ों की गिरफ्तारी, साथ ही एनआईए जांच की मांग — यह सब दर्शाता है कि मुर्शिदाबाद केवल एक जिला नहीं, बल्कि एक वैचारिक युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है।
क्या यह धरती कट्टरवाद का केंद्र बनी रहेगी या समरसता की मिसाल बन पाएगी?
यह प्रश्न न केवल बंगाल बल्कि पूरे भारत के सामने एक ऐतिहासिक चेतावनी की तरह है ¿




