
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमीर मुत्ताकी के बीच कूटनीतिक वार्ता में आया उल्लेख
लोक निर्माण टाईम्स विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली/काबुल:
भारत और अफगानिस्तान के बीच प्रस्तावित शहतूत बांध परियोजना को लेकर बनी सहमति ने पाकिस्तान की चिंता को और बढ़ा दिया है। यह बांध काबुल नदी पर बनेगा, जो पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में जाकर बहती है। इस परियोजना से जहां अफगानिस्तान को ऊर्जा और पेयजल की सुविधा मिलेगी, वहीं पाकिस्तान के लिए यह जल संकट का कारण बन सकता है।
भारत की रणनीतिक बढ़त:
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत की ‘वाटर डिप्लोमेसी’ की अहम कड़ी बन सकती है। भारत ने शहतूत बांध के निर्माण में वित्तीय सहयोग का प्रस्ताव दिया है और जल्द ही काबुल व कुनार नदियों पर संयुक्त रूप से निर्माण कार्य आरंभ किए जाने की संभावना जताई गई है।
एस. जयशंकर और मुत्ताकी की वार्ता:
गुरुवार को भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में शहतूत बांध को विशेष महत्व दिया गया। भारत ने आश्वासन दिया कि वह परियोजना को समयबद्ध ढंग से पूरा करने में अफगानिस्तान की हरसंभव मदद करेगा।
पाकिस्तान पर अफगानिस्तान का सख्त रुख:
सूत्रों के अनुसार, अफगान पक्ष ने स्पष्ट किया है कि काबुल या कुनार नदियों पर बांध निर्माण के लिए उन्हें पाकिस्तान से कोई अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। यह अफगानिस्तान की संप्रभुता के तहत आता है।
काबुल नदी हिंदूकुश से निकलकर पाकिस्तान तक जाती है, वहीं कुनार नदी उसमें मिलती है। इन दोनों नदियों पर बनने वाले बांधों से पाकिस्तान की जल आपूर्ति पर गहरा असर पड़ सकता है।
कूटनीतिक संदेश:
यह विकास न केवल दक्षिण एशिया की जल नीति को प्रभावित करेगा, बल्कि पाकिस्तान को आने वाले वर्षों में अफगानिस्तान पर निर्भर रहना पड़ सकता है। भारत की यह नीति एक सॉफ्ट पावर के साथ हार्ड हिट का संकेत देती है।
निष्कर्ष:
शहतूत बांध परियोजना भारत, अफगानिस्तान और समूचे क्षेत्र के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक ओर यह अफगानिस्तान को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाएगा, वहीं दूसरी ओर यह पाकिस्तान के लिए चुनौती बन सकता है। भारत की यह नीति जल कूटनीति (Water Diplomacy) के क्षेत्र में एक निर्णायक मोड़ हो सकती है।
रिपोर्ट: लोक निर्माण टाईम्स




