
लखनऊ।सरोजनीनगर तहसील और गोलागंज क्षेत्र से सामने आए दस्तावेज़ उत्तर प्रदेश के राजस्व तंत्र की गंभीर पोल खोलते हैं। खोजी पड़ताल में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि एक ही व्यक्ति—सैय्यद बहादुर हुसैन—को अलग-अलग मामलों में दो अलग वर्षों में मृत दिखाया गया, और इसी विरोधाभास का लाभ उठाकर नावेद हुसैन ने स्वयं को ‘एकलौता वारिस’ बताकर करोड़ों रुपये की जमीनों पर नाम चढ़वा लिया।
खोजी खुलासा–1 : एक व्यक्ति, दो मृत्यु प्रमाण
नगर निगम, लखनऊ द्वारा जारी वैध मृत्यु प्रमाण पत्र
मृत्यु तिथि : 25 अगस्त 1998,स्थान : लखनऊ
🔹 इमामबाड़ा/कब्रिस्तान से जारी कथित प्रमाण, दफन की तिथि : 23 मई 1969
स्थान : इमामबाड़ा गुफ़रानमआब, लखनऊ
सवाल
जो व्यक्ति 1998 में अस्पताल में मृत घोषित हुआ, वह 1969 में दफन कैसे हो सकता है?
खोजी खुलासा–2 : पाकिस्तान जाने की कहानी से जमीन पर दावा
खोजी दस्तावेज़ बताते हैं कि—
गोलागंज की संपत्तियों के लिए सैय्यद बहादुर हुसैन को 1968 में पाकिस्तान गया हुआ बताया गया
वहीं दूसरी ओर
कहीं 1969 में मृत,
और कहीं 1998 में मृत दर्शाया गया
तीन कहानियाँ, एक ही व्यक्ति
उद्देश्य एक — वैध वारिस हटाओ, जमीन पर कब्ज़ा बनाओ
खोजी खुलासा–3 : सही सजरा बनाम मनगढ़ंत सजरा
खतौनी व पुराने रिकॉर्ड में दर्ज सही सजरा
पीढ़ी-दर-पीढ़ी वैध उत्तराधिकार
राजस्व अभिलेखों से मेल
निरंतरता और दस्तावेज़ी प्रमाण
नावेद द्वारा प्रस्तुत मनगढ़ंत सजरा
बीच के वैध वारिस गायब
खुद को सीधे “एकलौता वारिस” दिखाया
पुराने रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं
खोजी पड़ताल में स्पष्ट है कि यह सजरा बाद में गढ़ा गया, ताकि नामांतरण कराया जा सके।
सेवई गांव का मामला : मकान को खेती दिखाकर खेल
सरोजनीनगर तहसील के ग्राम सेवई स्थित गाटा संख्या 780, 537 और 615 में
पहले से निर्मित मकान को राजस्व रिकॉर्ड में कृषि भूमि दिखाया गया
नाम चढ़ते ही कागज़ आगे बेच दिए गए
पीड़ित पक्ष के पास GPS फोटो, बिजली बिल और कब्ज़े के प्रमाण मौजूद
कानूनी जानकारों के अनुसार—
दो अलग मृत्यु प्रमाण = प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी
मनगढ़ंत सजरा = कूटरचना
इसके आधार पर हुआ नामांतरण कानूनन शून्य (Void)
ऐसे मामलों में
नामांतरण निरस्त
आगे की बिक्री अमान्य
और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई संभव
सरोजनी नगर तहसील से सीधे सवाल
दो अलग-अलग मृत्यु कथाएं किस स्तर पर स्वीकार की गईं?
मनगढ़ंत सजरा किस लेखपाल/तहसील स्तर से पास हुआ?
करोड़ों की जमीन बिकने से पहले जांच क्यों नहीं हुई?
क्या यह लापरवाही है या मिलीभगत?




