बलिया क्यों कहलाता है ‘बागी बलिया’? जानिए 1942 के उस ऐतिहासिक विद्रोह की पूरी कहानी”

लेखक: अशोक कुमार गुप्ता
प्रकाशन: लोकनिर्माण टाइम्स


“बलिया” – एक ऐसा नाम जो भारत की आजादी की लड़ाई में वीरता, विद्रोह और बलिदान का प्रतीक बन गया। इसे ‘बागी बलिया’ यूं ही नहीं कहा जाता, इसके पीछे है इतिहास के पन्नों में दर्ज एक गर्वपूर्ण और साहसी अध्याय— 1942 का बलिया विद्रोह।

19 अगस्त 1942: बलिया की बगावत का दिन

महात्मा गांधी द्वारा 8 अगस्त 1942 को शुरू किए गए भारत छोड़ो आंदोलन की चिंगारी जब बलिया पहुंची, तो यहां के रणबांकुरों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। 9 अगस्त से ही बलिया में जनाक्रोश चरम पर था। सरकारी दफ्तरों पर हमले, रेल पटरियों की उखाड़फेंक, थानों को जलाने जैसे क्रांतिकारी कदम उठाए गए।

16 से 18 अगस्त – शहादत की श्रृंखला:

  • 16 अगस्त: लोहापट्टी और गुदरी बाजार में पुलिस की गोलीबारी में दुखी कोइरी समेत 7 लोग शहीद हुए।
  • 17 अगस्त: रसड़ा में 4 लोग शहीद
  • 18 अगस्त: बैरिया थाने पर तिरंगा फहराते हुए कौशल कुमार सहित 18 लोग शहीद हुए।

19 अगस्त: जिला कारागार से क्रांति का शंखनाद

हजारों लोग बलिया के ग्रामीण इलाकों से चलकर जिला जेल के सामने एकत्रित हुए। जबरदस्त जनदबाव के आगे अंग्रेज कलेक्टर जे सी निगम और कप्तान जियाउद्दीन अहमद ने क्रांतिकारी पं. चित्तू पांडेय और उनके साथियों से वार्ता की और अंततः जेल का फाटक खोल दिया गया।

20 अगस्त 1942: बलिया बना आज़ाद भारत का पहला जिला

टाउन हॉल मैदान में चित्तू पांडेय, राधा मोहन सिंह, राधा गोविंद सिंह और विश्वनाथ चौबे ने स्वतंत्रता की घोषणा की। अंग्रेज कलेक्टर जे सी निगम ने खुद प्रशासन पं. चित्तू पांडेय को सौंपा।

  • पं. चित्तू पांडेय – बलिया के पहले स्वतंत्र भारत सरकार के कलेक्टर
  • पं. महानन्द मिश्रा – पुलिस अधीक्षक नियुक्त किए गए

यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पहली बार था, जब किसी जिले को अंग्रेजों से पूरी तरह मुक्त कर एक वैकल्पिक स्वराज सरकार का गठन किया गया।


बलिया को ‘बागी बलिया’ क्यों कहते हैं?

अशोक कुमार गुप्ता के अनुसार –

बलिया की इस ऐतिहासिक क्रांति, नेतृत्व, बलिदान और साहस के कारण ही इसे बागी बलिया कहा जाता है।
बलिया ने अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी, बिना नेतृत्व के भी क्रांति को आगे बढ़ाया और सबसे अहम— स्वराज की अवधारणा को धरातल पर लागू कर दिखाया।


बलिया का यह योगदान केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन गया।
आजादी के इतिहास में 19-20 अगस्त 1942 को बलिया ने जिस विद्रोही तेवर के साथ अपने वजूद को लिखा, वह हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।


 

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