
लखनऊ | विशेष संवाददाता
चारबाग स्थित मोहन होटल में 17 मई की रात लगी भीषण आग ने एक बार फिर लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की कार्यशैली और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आग के इस हादसे में करीब 30 लोग फंस गए, कई की जान बाल-बाल बची, लेकिन एलडीए के जिम्मेदार अफसर न तो मौके पर पहुंचे, न ही घटना के बाद कोई तकनीकी जांच कराई गई।
ना जांच, ना जवाबदेही – क्यों खामोश है एलडीए?
इस हादसे के 24 घंटे बीत जाने के बावजूद न तो यह देखा गया कि होटल का नक्शा पास है या नहीं, और न ही यह पता लगाया गया कि भवन वैध है या अवैध। जोनल अधिकारी विपिन शिवहरे, जिनके क्षेत्र में यह होटल आता है, से जब सवाल किया गया तो वह पहले पल्ला झाड़ते रहे और बाद में कॉल ही काट दी। व्हाट्सएप पर भी कोई जवाब नहीं दिया गया।
छोटों पर कहर, बड़ों को बख्शा!
यह दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना है कि एलडीए आम नागरिकों द्वारा बनाए गए छोटे मकानों पर तो तुरंत नोटिस, चालान और ध्वस्तीकरण जैसी सख्त कार्रवाई करता है, लेकिन जब बात ऐसे होटलों और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की होती है, जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, तो एलडीए की आंखों पर पट्टी बंध जाती है। मोहन होटल में सेटबैक, अग्नि सुरक्षा मानक, और आपातकालीन निकासी मार्ग जैसी बुनियादी चीजें तक नहीं थीं, फिर भी प्राधिकरण मूकदर्शक बना रहा।
इतिहास से कोई सबक नहीं!
याद रहे, चारबाग में सात साल पहले भी इसी तरह की लापरवाही के चलते नौ लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन लगता है एलडीए ने उससे कोई सीख नहीं ली। आज भी वही पुराना ढर्रा, वही लापरवाह रवैया जारी है।
प्रश्न सीधा और स्पष्ट है—
- क्या मोहन होटल का नक्शा पास है?
- अगर नहीं, तो एलडीए ने अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की?
- क्या जान का खतरा केवल आम जनता को है, रसूखदारों को नहीं?
जनता जानना चाहती है – कब जागेगा प्रशासन?
अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट संदेश होगा कि एलडीए में प्रभावशाली लोगों के आगे नियमों की कोई हैसियत नहीं है। आगजनी की घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए ज़रूरी है कि ऐसे अफसरों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो, और मोहन होटल जैसे भवनों की तत्काल जांच कर विधिसम्मत कार्यवाही की जाए।
रिपोर्ट: लोक निर्माण टाईम्स इन्वेस्टिगेशन डेस्क
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