बिना पक्ष जाने समाचार प्रकाशित करने पर उठे सवाल, जांच पूरी होने से पहले लगाए गए गंभीर आरोप

मोहनलालगंज, लखनऊ। सरथूवा गांव स्थित गाटा संख्या 174 एवं 175 से संबंधित भूमि विवाद को लेकर एक समाचार पोर्टल द्वारा प्रकाशित खबर पर सवाल उठने लगे हैं। संबंधित पक्ष का आरोप है कि समाचार प्रकाशित करने से पहले न तो उनका पक्ष लिया गया और न ही उपलब्ध राजस्व अभिलेखों एवं शिकायत पत्र की समुचित जांच की गई।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कम्पनी के एमडी  40015726064171 दिनांक 27-05-2026 को दर्ज की गई थी, जिसमें  तहसील प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी। आवेदन में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि गाटा संख्या 174 की भूमि किसानों बाबूलाल, सहदेवलाल गुप्ता, धीरज यादव एवं रामविलास आदि से विधिवत क्रय की गई है।
आवेदन के अनुसार कार्य के दौरान क्षेत्रीय लेखपाल द्वारा बताया गया कि भूमि का कुछ भाग सरकारी भूमि (जी.एस.) में आ रहा है। इसके बाद संबंधित भूमि को नपवाकर अलग छोड़ दिया गया तथा उस पर किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं कराया गया। शिकायतकर्ता ने स्वयं राजस्व विभाग से निष्पक्ष पैमाइश एवं जांच की मांग की थी।
सूत्रों के अनुसार मामला वर्तमान में राजस्व विभाग के समक्ष विचाराधीन है तथा अंतिम पैमाइश एवं जांच रिपोर्ट अभी आना शेष है। इसके बावजूद कुछ मीडिया रिपोर्टों में सरकारी भूमि पर कब्जे के आरोपों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, जिससे संबंधित पक्ष ने आपत्ति दर्ज कराई है।
संबंधित पक्ष का कहना है कि निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुसार समाचार प्रकाशित करने से पूर्व उनका पक्ष लिया जाना चाहिए था। उनका यह भी कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति, संस्था अथवा कंपनी को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
संबंधित पक्ष के अनुसार विवादित बताई जा रही भूमि गाटा संख्या 174 क, 174 ख, 175 ग एवं 175 घ सहित लगभग 3 बीघा क्षेत्रफल की भूमि है, जो कंपनी द्वारा किसानों से विधिवत क्रय की गई निजी भूमि का हिस्सा है। उनका दावा है कि कंपनी द्वारा किसी भी सरकारी ऊसर, बंजर अथवा सार्वजनिक भूमि पर न तो कब्जा किया गया है और न ही कोई अवैध निर्माण कराया गया है।
जानकारी के अनुसार राजस्व विभाग द्वारा मामले की जांच एवं पैमाइश कराए जाने की प्रक्रिया चल रही है। अब सभी की निगाहें प्रशासन की अंतिम जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
स्थानीय लोगों का भी मानना है कि जांच पूरी होने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा, ताकि तथ्यों के आधार पर सत्य सामने आ सके और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।

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